रविवार, 11 सितंबर 2011

राजस्थानी कहानियों का शानदार संग्रह

धान - कथावां

                     आज 10 किलोमीटर की ट्रेकिंग के बाद मेरे भाई और मित्र  डॉक्टर सत्यनारायण सोनी की राजस्थानी भाषा में प्रकाशित किताब ' धान - कथावां '  को पूरा पढ़ा । राजस्थानी कहानियों का यह शानदार संग्रह  हमारे ही एक अन्य मित्र  मायामृग के प्रकाशन ' बोधि प्रकाशन ' से प्रकाशित हुआ है ।
                            कुल 18 कहानियों के इस संग्रह में सत्यनारायण जी ने अपने आस-पास के उन छोटे - छोटे बिंदूओं और मानवीय संवेदनाओं के ताने -बाने को अपनी लेखनी से इस तरह रचा है कि पाठक को यही महसूस होता है कि ये सब घटनाएं उसके खुद के जीवन की हैं , और इन कहानियों को वो अपने-आप से जोड़ लेता है । मेरी इस बात से सभी सहमत होंगे कि पाठक को जब किसी की लेखनी अपनी जीवन कूची लगने लगे तो यह लेखकीय क्षमता का सीधा-सा प्रमाण है । लेखक ने अपने इस कहानी संग्रह को बेहद धैर्य और लम्बे अनुभव के बाद छपवाकर पाठकों को नज़र किया है , यह इस बात से समझा जा सकता है कि इसमें सबसे पुरानी कहानी 1997 की हैं और सबसे नई कहानी 2008 की है । पूरे पंद्रह साल के इंतज़ार और लेखकीय संशोधन के बाद 1997 की चार कहानियों को इसमें जगह मिली है । परलीका ग्राम, सरकारी सेवा , पारिवारिक अहसास और मूल्य , जीवन की आपा-धापी में कुछ पीछे छूटने का मलाल और सबसे खास समाज की मनस्थिति को बेहतरीन तरीके से इसमें विश्लेषित किया गया है । इस पुस्तक की 'आ फोटू अठै कियां' , 'हर-हीलो', 'जलम-दिन', 'चिबखाण' आदि कहानियाँ विशेषकर पाठक को इस बात से बखूबी अवगत करवा देती हैं कि सोनी जी का सबसे बड़ा सामर्थ्य यह है कि वे अपने चारों तरफ से उन घटनाओं को भी संवेदनशील हृदय से समझ सकते हैं जिन पर हमारा या तो ध्यान ही नहीं जाता और या फिर हम उन्हें शब्दों में बाँध पाने की योग्यता नहीं रखते हैं ।  पहली कहानी ' आ फोटू अठै कियां ' तो सभी भारतीय भाषाओँ में अनूदित होने की पात्र है ताकि एक विशाल पाठक वर्ग कौमी एकता को विश्लेषित तरीके से समझ सके । मेरे इस कथन की पुष्टि के तौर पर कहूँगा कि इस कहानी का हिंदी में अनुवाद सशक्त साहित्यकार मदनगोपाल लढा जी ने और गुजराती में श्री संजय बी. सोलंकी जी ने  कर दिया है । 
                         कुल मिलाकर यह राजस्थानी कहानी संग्रह राजस्थानी साहित्य को समृद्ध करेगा । अंत में इस किताब के पहले पृष्ठ पर छपी चंद आशावादी पंक्तियों को रख दूं जो शब्दों की साधक दुनिया की बात करती हैं---------
                            

                                 तोपूं छूं
                                सबद - पनीरी
                                 इण पतियारै -
                                 कदै तो निपजैली
                                धान-कथावां .......

रविवार, 12 जून 2011

कथा-प्रसंग: घमसाण

पोथी समीक्षा
कथा-प्रसंग: घमसाण

-कुन्दन माली

‘घमसाण’ में कुल सोळै कहाणियां है- घमसाण, उकळती पीड़, धूड़, उबाक, राशिफळ, लंगोटियौ, आ’लणौ, बलवंतियो, पतौरी भुआ, बदजात, घर, मुसाण, तेल, मुट्ठी रो कसाव, चोखलौ अर ऊसर जमीन अर आं कहाणियां में उत्तरी राजस्थान रै किसान री जीवाजूंण री अबखायां अर विडरूपतावां रा चितराम मौजूद है। इण रै टाळ जीवण रा नैना-नैना पण मेताऊ प्रसंग अर अभाव रा दरसाव ई है अर साथै आपसरी रिस्ता-नाता अर संवेदनाऊ ताना-बानां री बुणगट ई निंगै आवै।

दिनूगै इज भैंस रौ दूध काढ़ण री टैम भैंस दूध चढ़ाय देवै अर चौथू रै टाबरां नै चा रा फौड़ा पड़ जावै तद पाड़ौसी ई बहाना बणायनै दूध उधार देवण सूं नट जावै तद घर में घमसाण माच जावै। चौथू आपरी घरवाळी चम्पा नै भांडण ढूकै पण छेवट में चम्पा भैंस रौ दूध काढ़ लावै। इण ढाळै ‘घमसाण’ कथा जमानै री बदळती हवा रौ असर गांव तकात में घुस जावण री प्रवृत्तियाँ नै उजागर करै जद के दूजी कांनी ‘उकळती पीड़’ कहाणी लुगाई रै चरित्र माथै घरवाळै री संका नै परगट करै। संका अर अणविस्वास रै पांण गिरस्ती री गाड़ी रै गड़बड़ाय जावण रा घटनाक्रम साम्हीं आवै पण छेवट में मामलौ पाछौ सुधर जावै। क्यूंके मानवसुभाव नै समझणौ दौरी बात है, पण लुगाई जात पुरूस रै सुभाव नै सावळ ढंग सूं समझ लिया करै। ‘धूड़’ कहाणी मास्टर जेठाराम रै समचै नसाखोरी रै पांण आपरै सर्वनास री आदत नै उजागर करै अर इण बात री सांनी करै के नसाखोर मिनख नै सरम-लियाज के रोजी-रोटी अर आजीविका री नैतिक पवित्रता सूं कोई लेवणौ-देवणौ नीं व्हिया करै। ‘उबाक’ कहाणी में आ इज बात साम्हीं आवै जद बाप मूळजी आपरै बेटै मांगियै सूं माडाणी दारू मंगायनै पीवण में कोई सरम मैसूस नीं करै अर उण री गिरस्ती री हालत बिगड़तां जेज नीं लागै। ‘राशिफळ’ में ज्योतिष माथै अंधविस्वास सूं बेसी आस्था री बात उजागर व्है अर आस्था नै तर्क री ताकड़ी में नीं तोली जाय सकै। ‘लंगोटियौ’ में पीढि़यां रै हेतभाव माथै बदळतै जमानै री हवा री तासीर नै अरथावण री कोसिस करी है।

‘बलवंतियौ’ अर ‘बदजात’ दोनूं कहाणियां में धार्मिक अर समाजू पाखंड अर कुरीत री बात है अर आ बात है करियावर री। बलवंतियौ आपरै पिता रै मिरतुभोज सूं नट जावै क्यूंके वौ इण चीज नै आछी नीं मानै अर उण री माली हालत ई कोई चोखी नीं है। पण औ मामलौ ‘बदजात’ कहाणी में ओर ई आगै जाय पूगै जद बदळू नै पिंडत लोग उण री गाय रै मरियां पछै ई किरिया-करम करण नै मजबूर करै अर जद वौ नीं मानै तौ आखौ गाम उण रौ बायकाट कर देवै अर उण नै खुद इज मरी थकी गाय नै घसीटनै हाड़ा-रोड़ी में नाखै। अठै आपां नै कथाकार री संवेदना नै समझण वास्तै पतौरी भुआ नाम रै पात्र री मनगत नै समझणी पड़ै- ‘भाभी थूं म्हारै कानी देख। जीवण मांय अबखायां रै सिवाय ओर कीं नीं मिळ्यो, पण जीवण री आस अबार ई बाकी है। जूण तौ पूरी करणी ईज पड़ै। कोई हंस-खेल’र बिता देवै तौ कोई चिंता मांय डूब’र। अबखायां रौ मुकाबलौ करण री हिम्मत राखणी चाइजै।’ ‘आलणौ’ कथा री कमली व्हौ चावै ‘पतौरी भुआ’, अै दोनूं ई चरित्र जूंण सूं लड़ता-भिड़ता पात्र इज है अर सुख-दुःख वां रै साथै आंख-मिंचावणी रौ खेल खेलता रैवै। अनाथ होवण री पीड़ अर दायजा वास्तै बहुवां नै मार देवण री अमानवीय टेव रा दरसाव ई अठै परगट व्है।

परम्परावां रै खंडन अर मंडन नै ‘घर’ अर ‘मुसाण’ कहाणियां में देख सकां। जठै अेक कानीं गाड़ोलिया लुवार रै परिवार रै समचै घर मांडण री परम्परा री सांतरी सरूआत ‘घर’ कहाणी में व्है, तौ दूजी कानीं ‘मुसाण’ कहाणी कहाणी में जीवण री आपाधापी रै पांण मिनख री मिरतु रौ मुलायजौ कायम नीं राखण री बात उजागर व्है। मानवीय सम्बन्धां अर परम्परावां नै अबै निभाय लेवणौ दोरौ लखावै क्यूंके किणीं रै कनै टैम नीं है। टैम री कमी रै कारण मुरदै रौ दाग देंवती बगत कोई वठै छेकड़ सुधी नीं रुकै। आ असल में मिनख रै मसीन बणता जावण  री प्रक्रिया इज है। ‘तेल’ कहाणी भारतीय समाज रै मामूली मिनख री बेबसी, लाचारी अर आक्रोस नै उजागर करै तौ दूजी कानीं ‘मुट्ठी रौ कसाव’ में बुढ़ापै में मां-बाप नै बिसराय देवण री औलाद री मनगत अर मावितां री पीड़ नै वाणी देवण री कोसिस करी है। बाल-मनोविग्यान री दीठ सूं ‘चोखलौ’ अर किसोर मनोविग्यान री दीठ सूं ‘ऊसर जमीन’ उल्लेखजोग है। मिनखांजूण में संवेदना रै अलोप होवता जावण री प्रक्रिया नै लेखक चोखला रै मारफत उजागर करै जिकौ खेत में फसल बरबाद करती चिड़कली रै मर जावण सूं काठौ दुःखी व्है जावै अर दूजी दांण भाटै री मार सूं कागलै रै मर जावण पछै उण री भूख-तिरस ई मर जावै पण उण रौ काकौ तौ इण बात नै सफा मामूली इज मानै। ‘ऊसर जमीन’ में भोपा-भोपी री पड़ बांचण रौ काम चालै पण किणीं जवान रौ ध्यान पड़ सुणण सूं बेसी तौ टीका-टीपणी अर मसखरी में इज बेसी रमै। अबै टीवी अर वीडियो रै आणंद साम्हीं पड़ री कांई बिसात? जीवण री मीठास अर मिनखीचारै रै मोलां रै लोप होवण री बात अठै उजागर व्ही है।

‘घमसाण’ री कहाणियां रौ शिल्प, भासा अर भावसंवेदन इण रै चरित्रां रै अनुभव अर अनुभूतियां नै सचेत, सावचेत अर सावळ ढंग सूं पेस करण में सक्षम लखावै अर कहाणियां रा छोटा-छोटा वाक्य अर संवाद-शैली कथा-प्रवाह नै वैवस्थित ढाळै आपरै मुकाम सुधी पूगावै। इण रै ढाळ विस्वासजोग चरित्र अर जूंण री जीवंत छवियां सूं सम्पन्न पात्र आं नै प्रामाणिकता बगसै। कथा-सूत्र री सावळ समझ अर कथा बुणगट में बेकार रौ उळझाव नीं होवणौ ई इण खूबियां में गिण्यौ जावणौ चाईजै।

पोथी संदर्भ: घमसाण/ कथा संग्रै/ सत्यनारायण सोनी/ सुरजीत प्रकाशन, व्यापारियान मोहल्ला, बीकानेर (राजस्थान)/ पैली खेप 1995/ पेज 80/ मोल 80 रिपिया।

शनिवार, 28 मई 2011

परलीको एक कहाणी गांव

परलीको एक कहाणी गांव
-रामस्वरूप किसान
(जागती जोत: अगस्त, 2002 में ‘उतराधै सिंवाड़ै री राजस्थानी कहाणी’ सिरैनांव सूं छप्यै आलेख रो अंस, जिणमें है इण आंदोलन री पगचाप।)

मोहन आलोक रै सबदां में परलीको एक साहित्यिक गांव। पण म्हारै सबदां में एक कहाणी गांव। जठै छः-छः लिखारां री कलम चालै। तीनां रा तीन संग्रै ‘हाडाखोड़ी’, ‘घमसाण’ अर ‘जीव री जात’ अर दोवां रा पांडुलिपि रूप में त्यार। अर एक कन्नै सांगोपांग खुदरा कहाणियां।

उपरोक्त रचना विगत नै लिखारां रै नांव विगत में बदळां तो सामणै आवै- रामस्वरूप किसान, सत्यनारायण सोनी, भरत ओळा, रामेश्वर गोदारा ‘ग्रामीण’, मेहरचंद धामू अर संदीप धामू।

म्हैं म्हारी बात सत्यनारायण सोनी सूं सरू करूं। बां रो कहाणी संग्रै 'घमसाण’ सन 1995 में छप’र साम्हीं आयो। ईं संग्रै में कुल 16 कहाणियां। भासा अर शिल्प री दीठ सूं ओ कहाणी संग्रै साव नूंवो। कथ्य री बात करां तो ग्रामीण परिवेस नै परोटती कहाणियां। कहाणी ‘घमसाण’ मरद जात रै उण अहं कानी संकेत करै जको जुगां-जुगां सूं लुगाई जात नै पीसतो आयो है। कहाणी रो नायक चौथू मामूली-सी बात पर आपरी जोड़ायत चम्पा पर लाल-पीळो होवै। कूटण तांईं ढुकै। पण बीच में टाबर आ जावै। ईं बात नै लेय’र घर में घमसाण होय जावै। बात खुल्लै जद चम्पा बेकसूर निकळै। अर चौथू रा कान खुस’र हाथां में आ जावै। ईं संग्रै री एक कहाणी है ‘उकळती पीड़’। कहाणी रै पातर जम्मीदार सूं कोल्हू में गन्नै री भांत निचोड़ीज’र मांची पर पड़्यो है। आंख्यां री जगां फगत दो खाडा। जकां में धोळो पत्थर सो चिलकै। घर रो धाको उण री जोड़ायत धिकावै। एक दिन जद बा घास नै जावै। घरां आवण में खासा मोड़ो कर द्यै। आंधो कीड़ू माची पर पड़्यो-पड़्यो उणनै उडीकै। पण बा नीं आवै। कीड़ू री उडीक सक में बदळै। अर उण रै काळजै भूचाळ उठण लागै। बा अंधारो रळ्यां आवै। बीं रा पग बाजतां ई कीड़ू री रीस ऊफाण खावै।
‘अरै रांड आयगी?’
‘आयगी’ गीता हाथ झड़कांवती उत्तर दियो।
‘पण थे ईंया कियां बोलो हो?’
‘हां-हां म्हैं तो तनै ईयां ही बोलतो लागस्यूं अब। मीठो तो कोई और बोलतो होसी।’
कीड़ू बोलतो रैवै। बा चुप्प। पण जद उणरी चुप्पी टूटै तो कीड़ू री आंधी आंख्यां बरस पड़ै। बा कैवै- ‘इण घर मांय आयां पछै एक दिन ई सोरो सांस नीं लियो। दिन-रात खोरसो ई खोरसो। आंधां होयां पछै म्हैं कित्ती अबखायी झेली है। ठा कोनी? दोनूं बगत रोटी रो जुगाड़ कोई मतै नीं हो जावै। आप भूखी रैवूं अर थानै धपाऊं। तो म्हैं ई छिनाळ। कम सूं कम बाडेड़ै पर लूण तो ना छिड़को।’ आंधै कीड़ू री आंख्यां बैवण लागै। ईं संग्रै रै अलावा सत्यनारायण सोनी री एक सांतरी कहाणी है- ‘चिबखाण’। जकी में लेखक री मनोवैज्ञानिक दीठ रो पतियारो मिलै।

जद मनोविज्ञान री बात आवै तो भरत ओळा री कहाणी ‘गाबाचोर’ आपरै नूंवै तेवर साथै सामणै आवै। ईं कहाणी में लिखारै एक इस्सै पात्र री पीड़ रो चितराम उकेरयो है जको मौन कुंठावां सूं पीडि़त है। बो आप री ईं पीड़ नै बुझावण सारू जनानियां रा गाबा चोरै। गाबां नै सूंघै अर काम नै पोखै। इण विसै माथै एक दूजी कहाणी है ‘एक फितूर म्हारै ई’। ईं कहाणी रो पात्र काम सूं पीडि़त होय’र आपरै एक दोस्त री जोड़ायत नै फोन करै। अर आप रो माजणो देवै। ईं कहाणी में लिखारै आदमी रै भीतर रै मैल नै घणै कलात्मक रूप सूं गूंथ्यो है। भरत ओळा रो कहाणी संग्रै ‘जीव री जात’ सन 1998 में छप’र आयो। ईं संग्रै में कुल 16 कहाणियां। संग्रै री कहाणी ‘पट’ किरसै रै दरद री कहाणी। ओळां सूं उण री खेती नष्ट होवै। सगळा सपना टूटै। अर बो पागल होय जावै। संवादां रै जरियै चालण वाळी आ कहाणी घणी मार्मिक बणै। भ्रूण-हत्या माथै लिख्योड़ी कहाणी ‘जीव री जात’ एक लांठी समाजू बुराई कांनी आंगळी करै। आज ई आपणै समाज में छोरै-छोरी रो भेद मिनखपणै माथै आकरो सवाल। ‘जीव री जात’ में ईं री सांगोपांग पड़ताल करीजी है। संग्रै में एक कहाणी है- ‘बखत सूं पैली’। आ कहाणी साव न्यारी-निरवाळी। ईं कहाणी रो पात्र तीन मोर्चां माथै लड़ै। पण मून। कीं नीं बोलै। पात्र रो ओ मून ई ईं कहाणी री ताकत बणै।

गांवां री अबखायां नै एक अलग कोण ई कोण सूं परखणियो लिखारो है अठै रामेश्वर गोदारा ‘ग्रामीण’। ईं लिखारै री एक दर्जन कहाणियां में गांव आपरै न्यारै ई तेवर में आयो है। रामेश्वर कनै कहाणी रो एक सांतरो अर नूंवो रूप देखण नै मिलै। आपरै आजाद पात्रां रै जरियै अण लिखारै गांव रै स्वाभिमानी रूप नै प्रगट्यो है। लिखारै रा पात्र आपरी गतिशीलता सूं खुद कहाणी बुणता नजर आवै। लिखारो आप मूं सूं कीं नीं कैवै। अठै स्थिति रो नान्हो विश्लेषण कहाणी नै रचै। अबोटपणै री दीठ सूं देखां तो रामेश्वर कन्नै कई सांतरी कहाणियां लाधै। ‘छिबकली’ एक इसी कहाणी है जकी में लिखारै मिनख री तुलना छिबकली सूं कर’र आदमी रै भीतर रो छिबकली-पणो बारै काढ्यो है। लेखक एक जगां कैवै- ‘छिबकली साथै म्हारी इत्ती बातां मिलै तो म्हनै बैम होवै कै कठैई म्हैं छिबकली तो नीं हूं जकी इण जुग रै मुजब ढळ’र जीय रैई है।’ एक बीजी कहाणी ‘चिल्लै उतरता लोग’ मांय कटती परम्परा अर उजड़तै संस्कारां री ऊंडी चींत है।

परलीकै गांव में ई एक जाण्यो-पिछाण्यो नांव मेहरचंद धामू। लारलै दस बरसां सूं लगोलग कहाणी मांडै। पांडुलिपि रूप में 17 कहाणियां त्यार। अठै म्हैं बां री एक कहाणी रो संदर्भ देवणो चावूं। बा कहाणी है ‘कादो’। ईर्षा रो कादो। जकै में कबाड़ रो धंधो करणियां दो मजूर केटैगरी रा मिनख कळीजै। दोनां कन्नै साईकिल। कबाड़ खरीदण सारू तपतै तावड़ै एक गांव में बड़ै। दोनां में इत्तो ईसको कै एक-दूजै नै खाण वाळी दीठ सूं देखै। एक जणो एक घर में कबाड़ खरीदण बड़ै। सोदो जचाणै री कोसीस करै। पण जचै कोनी। इतराक में दूजो आवै अर ऊंचै दामां में कबाड़ खरीद लै। पैलै कबाडि़यै रै आग-आग लाग जावै। बो बीं नै खरी-खोटी सुणावै। पण बो अणसुणी कर’र साइकिल नै भळै दब ले जावै। लारै सूं दूजो भाजै अर उणनै एक घर सूं कबाड़ खरीदतै नै आडै हाथां लेवै अर रीसां बळतो दूणै दामां में कबाड़ खरीद लै। ईं होड़ा-होड़ी में दोनूंवां रा गाबा जगण लाग जावै। बां दोनूंवां री साइकिलां घाटो खाय’र खरीद्योड़ै कबाड़ सूं लोड होय जावै। अर दूजी कांनी दोनूं कबाडि़या लोड होय जावै रीस सूं। ईं रीस रै आवेग में अचाणचक एक री साइकिल कादै में फंसै अर कहाणी आप रो अरथ हासिल करै।

इणी गांव रो एक फळापतो कहाणीकार संदीप धामू। जकै री ‘बूढियो पीपळ’, ‘हिड़क’, ‘संदोखी’, ‘ऊंडो अरथ’, ‘तकदीर’ अर ‘बिल्लो’ आद कहाणियां घणी चावी।

अब इण परचै रो लिखारो बकोल कुन्दन माली सामणै आवणो चावै। क्यूंकै खुद सारू कैवणी खुद रै ताबै नीं आवै। कुन्दन माली लिखै- ‘गांव रो उत्तर आधुनिक उणियारो ‘हाडाखोड़ी’ (2000)....रामस्वरूप किसान किसान री कहाणियां में दलाली रो मुद्दो अणूतो सैंसिटिव मुद्दो बणनै उजागर होवै। जकी तीन भांत री है- पशु-बोपार में होंवती दलाली (‘दलाल’ अर ‘गा कठै बांधूं’) अनाज रै बोपार में चालण वाळी दलाली (‘बापू’ अर ‘जाळसाजी’) अर छेकड़ में चुनाव अर सत्ता में चालण वाळी दलाली (‘रंग’, ‘पांच बोटां रो धणी’ अर ‘बूबड़ी’)। इण री वळै चौथी भांत ई कर सकां- धरम री दलाली (‘काग पड़ै कुत्ता भूंसै’, ‘बनवारियो’) प्रक्रिया री घटनावां, गांव रै लोगां री मजबूरी अर बैरभाव संवेदनावां अर सम्बन्धा सूं जुडि़या कथ्य ई कहाणी रचणा रा आधार बणनै प्रगट होवै।

....‘दलाल’ रो नायक तनसुख मिनख रै मानवीय उणियारै, दयाभाव अर संवेदना री मुंडै बोलती तस्वीर बणनै उजागर होवै- ‘आज पूरा बीस बरस होयग्या दलाली करतै नै। पण इस्यो कठै ई नीं फंस्यो। आज अण बूढियै बीस बरस री दलाली री सजा एक ई झटकै मांय दे दी। म्हारै सांम्ही दो भूखा चितराम आप-आप रा हाथ पसारयां खड़्या हा। आ बात म्हारो काळजो खावै ही कै किसै नै बचावूं? ओ सवाल म्हारै सांम्ही नागो होय’र नाचै हो कै म्हैं कासी नै मारूं’क बूढियै नै? हां कैवूं कै नां? हां रो अरथ बूढियै री हत्या तो नां रो कासी री।’ बूढियो फेरूं बोल्यो, ‘तनसुखजी चालां कासी वाळै घर कानी?’ म्हारै मुंडै सूं चीख निकळगी, म्हैं दलाल कोनी बूढिया! सुवांज आवै सो कर।’ (पेज-11-12) मिनख री अन्तर-आत्मा कदैई धोखो नीं देवै अर मोकैसर बा दूध रो दूध अर पाणी रो पाणी कर नाखै, आ बात तनसुख री खीज रै पाण उजागर होवै। एक इज झटकै में बेईमानी रो तानो-बानो बिखर जावै। ओ मोड़ कहाणी रो टर्निंग पाईन्ट ‘गा कठै बांधूं’ कहाणी में प्रगट होवै। पण बठै नतीजै में साम्ही आवै सोसक री दोवड़ी मनगत। धरम रो पुण्य तो आपां नै मिलै, पण धरम री सेवा-चाकरी रो काम दूजा लोगां रो है। आ मनगत सेठ रै चरित्र में है। ‘गळै में जनेऊ अर माथै पर टीकै वाळो एक आदमी गा री सांकळ झाल्यां खड़्यो हो। दूजी कांनी सेठ मुनीम नै आदेस दियो- ‘जा पुरोहितजी रै खूंटै गा बंधाइया।’ (पेज-52)

.....व्यक्तिपरक, निजू अर रचना प्रक्रिया रै प्रसंगां नै प्रगट करण वाळी कहाणियां में ‘दूजो चैरो’, ‘बो’, ‘लांठी कहाणी’ अर ‘ओळ्यूं रो हिस्सो’ इत्याद है। जिकी में रचनाकार रै चारूंमेर रै वातावरण, उण री रचनाऊ दोगाचिंती इत्याद रो खुलासो होवै। संवेदना अर सम्बन्धा रै बदळतै उणियारै रो दरसाव ‘सबदां रो हथोड़ो’ कहाणी में निगै आवै। ‘काचै दूध रो लोटो’, ‘घरळ-मरळ’, ‘हाडाखोड़ी’ अर ‘एक स्यो और’ सरीखी कहाणियां में मिनखा जूण री लाचारी, विवसता अर पेट भरण री नितरोज री मुस्किलां अर सवालां सूं आपां रो सामणो होवै।

........भासा री दीठ सूं ऐ कहाणियां खासा पतियारो जगावै। कथ्य अर भाव रै साथै अनुभव अर जथारथ में रची-पची सबदावळी उण चीज री सानी करै जिकी नै टी.एस. एलियट ‘आब्जैक्टिव कारिलेटिव’ कैयनै बिड़दायी है। इणरो मतलब है- घटना, प्रसंग कै तथ्य रै मुताबिक, उण रै वजन नै धारण करण वाळी वाजिब भासा रो उपयोग। अठै भासा में इधको तिलिस्म कै चमत्कार नीं है, रोजीना रै वैवार में काम आवण वाळी, गांव अर बठै रै वासिन्दा री, किसानां री भासा नै इज कथाकार आपरै हुनर अर रचनात्मक होसियारी रै पाण कथा-भासा में आतविसवास सूं ढाळ देवै। आं कहाणियां में मौजूद अनुभवां मांय सूं घणकरा अनुभव कथाकार रा आपरा निजू अनुभव ई रैया होवैला जिका कै सावळ निगै आवै है। इण वास्तै जे आपां इण भासा नै रचनापरक अनुभव वाळी, साफ-सुथरी पाधरी, सूत्रात्मक अर कम सूं कम सबदां में मुद्दै री बात अरथावण वाळी भासा रै रूप में ओळखां तो ई कोई बेजा बात नीं होवैला। अठै ‘कन्टेन्ट’ अर भासा रो सांतरो बैलेंस निगै आयां टाळ नीं रैवै। ठौड़-ठौड़ केवतां, मुहावरा, रीस अर खीज में दियोड़ी गाळ्यां अर अंग्रेजी सबदां रो सुभाविक उपयोग इण भासा रै जीवती-जागती भासा होवण री साख भरै। ‘हाडाखोड़ी’ री कहाणियां आपरै कथ्य रै पाण इज नीं बल्कै भासा री दीठ सूं ई आदरीजैला। इसी साफ-सुथरी, सारथक, पाधरी अर टू द पाईन्ट संवेदनाऊ अर अनुभवपगी भासा रै वास्तै रामस्वरूप किसान नै कथाकार री निजू ठौड़ थरपैला इज।