बुधवार, 6 जून 2012

राजस्थानी कहाणी रो बदळतो मिजाज

पोथी-परख

राजस्थानी कहाणी रो बदळतो मिजाज


‘धान कथावां’ चावा कथाकार सत्यनारायण सोनी री कहाणियां रो दूजो संग्रै है, जको बोधि प्रकाशन सूं प्रकाशित हुयो है। आपरी पैली पोथी ‘घमसाण’ (1995) सूं राजस्थानी कहाणी रै आंगणै ठावी ठौड़ बणावणियां सोनी आपरो निजु मुहावरो रचै। जठै कहाणी री कोई संभावना नीं दीसै, बठै सूं सांतरी कहाणी काढ़णै रो आंटो सोनी नै जाणै वरदान रूप हासल हुयोड़ो है। कथ्यगत नूंवोपण अर शिल्पगत मौलिकता रै पाण सोनी कथा विधा में न्यारी ओळखाण बणाई है अर ओ दूजो संग्रै इण ओळखाण नै पुखता करतो दीसै।

विषयगत नूंवैपण री दीठ सूं ‘धान कथावां’ इण विधा री महताऊ पोथी मानीजैला क्यूंकै इणमें अजैंलग केई अबोट कथानकां माथै टणकी कहाणियां मांडीजी है। आखती-पाखती रा साधारण दीसता दरसावां अर जीयाजूण री छोटी-मोटी घटनावां नै कथाकार इण चतराई सूं अंवेरै कै अंत तांई पूगतां-पूगतां कहाणी पाठक सारू साव नूंवो अणभव बण जावै। सोनी री कहाणियां में सामाजिक विसंगतियां सागै मानखै रै बदळता उणियारां री सूक्ष्म पड़ताल करीजी है। आं कथावां में राजस्थानी परिवेश खासकर उतरादो अंचल मूंडै बोलतो दीसै।

घर रै पूजा रै थान में लाग्योड़ी अेक फोटू नै लेय‘र लिख्योड़ी पोथी री पैली कहाणी ‘आ फोटू अठै कियां’ इण पोथी री टाळवीं रचना है, जकी लेखक रै निजु जिनगाणी री केई बातंा नै इण ढाळै आपस में जोड़ै कै आ कहाणी आपरी पूरणता में कौमी अेकता अर भाईचारै री सबळी ओळखाण बण जावै। साम्प्रदायिक सद्भाव नै लेय‘र बिना किणीं नारेबाजी रै आ कहाणी कट्टर अर संकीर्ण सोच नै तो चवड़ै ल्यावै ई ल्यावै, मिनखपणै री उदार मनगत नै ई सबळाई सूं साम्हीं ल्यावै। कथानायक (लिखारै) रै भायलै रै घरै नामी गायक मोहम्मद रफी री फोटू देख'र एक आदमी सम्प्रदाय विसेस सारू अपमानजनक सबद बरततां आंगळी उठावै तो बठै ई कथानायक री जोड़ायत आपरै घरै पूजा रै थानां में हड़मानजी अर दुरगा री फोटुवां बिचाळै चांद-तारै री चितराम अर ईद मुबारक लिख्योड़ी फोटू राख'र मिनखपणै रो मान बधावै।

छाती कहाणी री मीरां आपरी छोरी राणती सूं उणरै बाप रै सुरगवास री बात नै लुकोवै। सवा बरस तांई बा टाबर नै भुळायां राखै पण दीवाळी रै मोकै छोरी हठ झाल लेवै अर घड़ी-घड़ी ‘बापू कद आसी?’ री रट लगा देवै। आखती हुय‘र मीरा राणती रै एक चट्टू चेप देवै अर रोंवती-रोंवती बता देवै- ‘ बेटा, म्हैं ई हूं तेरी जो कुछ हूं। म्हैं ई तेरी मां, म्हैं ई तेरो बापू, भाई-बैण.....सो कीं म्हैं ई हूं.......।’(पृ.29) इंन्नै छोरी एकर बांथ घाल‘र माऊ री छाती सूं काठी चिप जावै अर बीं‘नै कहाणी री गळगळी संवेदना पाठक रै हियै उतर जावै।

‘समंदर’ कहाणी रै सुरेन्द्र रो इग्यारै बरसां रो बेटो पांच साल पैली गमग्यो। इण पीड़ नै अंतस में लियां ई बो मुळकै अर कथानायक (लिखारै) रै भायलै रामेश्वर री कहाणी सुण‘र दाद देवै। सुरेन्द्र रो मासूम सवाल ‘पता नहीं क्यूं, कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरा बेटा मुझे मिल जाएगा। एक न एक दिन तो मिल ही जाएगा ना? (पृ.25) कथानायक रै मूंडै सवालिया निसाण लगावै बठै ई पाठक रै अंतस रै समंदर में ई तूफान ल्या देवै।

‘हर-हीलो’ इण पोथी री सांतरी कहाणी है जिण में एक चपरासी रै ओळावै सामाजिक जथारथ री पुड़तां खुलती निगै आवै। दादै चपरासी, प्रिंसीपल अर बलवंतै मेहतर री मारफत आ कहाणी मानखै री मनगत री बारीकी सूं फिरोळ करै। स्टाफ-रूम में बीड़ी चूंचावतै दादै चपरासी री सोच ‘किसी’क बखत री इसी-तिसी होयी है- जिका प्रिसीपल बणना चाइजै हा, बै तो बणग्या चपड़ासी अर जिका चपड़ासी बणना चाइजै हा, वे बण्या बैठ्या है प्रिंसीपल!’ (पृ.17) में आपां इण मनगत नै पड़तख जोय सकां।
डायरी शैली में लिख्योड़ी ‘अळोच’ कहाणी ई टाबर गमणै री मार्मिक कहाणी है। अखबार री खबर सूं परलीका सूं गम्योड़ो छोरो तो लाध जावै पण हनुमानगढ़ जंक्षन रेलवे स्टेसन माथै सदीव सारू आपरै छोरे नै गमा चुकी लुगाई रा आंसू कींकर ठमै। ‘छींकी’ कहाणी छोटी पण नारी मनगत अर बाल मनोविग्यान री सांतरी कहाणी है। इण कहाणी में कलावती रै मिस आपां लुगाई जात री आकांक्षावां अर अवरोधां री फिरोळ कर सकां। बानगी- ‘कलावती एकर-सी खुद पतंग बण ज्यावै। बा ई उडणो चावै आभै मांय। उडारी भरणी चावै। सोचै, कोई बीं नै उडावै। कोई छींकी देवै। बा उड ज्यावै आं भीतां सूं पार।’ (पृ.57) दूजै पासै पांच बरस री बायली ‘सुमना’ माऊ सूं झ्याज मांगै- पतंग लूटण सारू। पोथी री बोतलां, चिबखाण, जलम दिन जैड़ी कहाणियां ई सैंजोरी है।

    नामी कथाकार मालचंद तिवाड़ी रै मुजब ‘कहाणी एक एड़ी विधा है जिणरै लेखक नै काई लिखणों है इणसूं बेसी समझ इणरी हुवणी जरूरी है कै काई नीं लिखणो है?’ सत्यनारायण सोनी री कहाणियां इण कसौटी माथै खरी उतरै। आ खामचाई लाम्बी साधना रो फल ई मानीज सकै कै आं कहाणियां में एक ओळी ई फालतू नीं लागै। केई ठौड तो इंयां ई लखावै कै कथाकार नै कहाणी सरू करणै सूं बेसी खतम करणै री उंतावळ है।

आज री कहाणी में पैलां दांई कथातत्व री घणी जरूरत कोनी रैयी। अबै पात्रां रै मन मांयली दोघा-चींती अर परिवेश रै बिसवासू चित्रण में ई कहाणी री सफलता मानीजै। इणरै बावजूद म्हारै मनग्यान कविता में जिंयां कवितापण जरूरी है बिंयां ई कहाणी में कथारस हुवणो ई चाइजै। इण दीठ सूं ‘छोटी-सी बात’ जैड़ी कहाणियां साव झीणै कथातत्व रै कारण भरती रै खातै ई खताइज सकै। पोथी री कहाणियां में एकरसता सूं बचणै सारू ई जतन जरूरी लखावै।

‘एक और मुकामो’ कहाणी में नामी कथाकार रामकुमार ओझा री दबंग नारी पात्र ‘मुकामो’ रै उल्लेख सागै उणरै जोड़ री लुगाई रो सांवठो चरित्र साम्हीं आवै। इणींज भांत मनोज कुमार स्वामी ई आपरी एक कहाणी ‘कैदी’ में सिरै कथाकार करणीदान बारहठ री कहाणी ‘थे बारै जावो’ रो वर्णन करै। आं ओळ्यां रै लिखारै री एक कहाणी ‘आफळ’ में ई लूंठा कथाकार सांवर दइया, रामस्वरूप किसान अर प्रमोद कुमार शर्मा री कहाणियां रै पात्रां रो जिकर हुयो है। कहाणी में बीजी कहाणियां रै सांवठै चरित्रां रै उल्लेख नै आपां आज री राजस्थानी कहाणी री एक नूंवीं प्रवृति रै रूप में ई ओळख सकां। 

शिल्प रै स्तर पर सत्यनारायण सोनी सांतरा प्रयोग कर्या  है। बां री घणखरी कहाणियां आत्मकथ्य रै रूप में है। केई कहाणियां में डायरी, संस्मरण अर रेखा-चितराम जैड़ी विधावां रा ऐनाण अर सध्योड़ी भाषा शिल्प री साख नै सवाई करै। राजस्थानी कहाणी रै बदळतै मिजाज री ओळखाण करांवती इण पोथी सारू सोनी नै घणां रंग।

पोथी-धान कथावां, कथाकार-सत्यनारायण सोनी, प्रकाशक-बोधि प्रकाशक, संस्करण-2010, मोल-25 रिपिया

- डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
144, लढ़ा-निवास, महाजन


‘राजस्थली’ अंक 113, जनवरी-मार्च, 2012 सूं साभार...
   

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